फकिर

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सातों पेहर आपकी उन्सके जुस्तजुमैं
खाना-ब-दोश हम दरबदर फिर्ते रहैं
शामों-शेहर यूही कोही मौउत्जाके मुन्तजिरमे
हम कत्रा-कत्रा गिर्ते रहैं

काफिरोंकी बेकरारीमैं गुजरते हुए हम मुसाफीर भटक्ते रहैं हैं
आप मञ्जिल-ए-रुहानियत मुसल्सल हमेशा सिर्फ यह तय हैं

फासलोंके यह रेगीस्तानी गुल्सनमैं
मेहक्ती हुई ख्वाब कोई हर शाम खिल्ते रहैं
मेरे बेजुबा नवाजोंमैं, मेरे बेराग कल्मोंमैं
बा-खुदा आप ही आप हर नाम मिल्ते रहैं

आपकी आसनाके बेपन्हा जुनुनियत लेकर के
खाना-ब-दोश हम दरबदर फिर्ते रहैं
बेइन्तहा आपकी इज्तिरारमैं इन्तजार कर्-कर के
हम कत्रा-कत्रा गिर्ते रहैं

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